Wednesday, April 29, 2020

શ્રદ્ધાંજલિ ‘સાત પગલાં આકાશમાં’ નામની પ્રસિદ્ધ ગુજરાતી કૃતિનાં લેખિકા કુંદનિકા કાપડિયાનું નંદીગ્રામ ખાતે નિધન

સાત પગલાં આકાશમાં’ નામની પ્રસિદ્ધ ગુજરાતી કૃતિનાં લેખિકા કુંદનિકા કાપડિયાનું નંદીગ્રામ ખાતે નિધન



સાત પગલાં આકાશમાં’ નામની પ્રસિદ્ધ ગુજરાતી કૃતિનાં લેખિકા અને પરમ શ્રદ્ધેય ઋષિ મકરંદ દવેના પત્ની કુંદનિકા કાપડિયાનું નંદીગ્રામ ખાતે 93 વર્ષની વયે નિધન થયું છે. કુંદનિકા કાપડિયાએ 29 એપ્રિલે મોડી રાત્રે અંતિમ શ્વાસ લીધા હતા. તેમનો જન્મ લીંબડીમાં 11 જાન્યુઆરી 1927ના રોજ થયો હતો. તેઓ એક નવકથા અને સ્ટોરી રાઈટર હતા. તેમને ગુજરાતી સાહિત્યમાં યોગદાન આપવા બદલ સાહિત્ય એકેડમી એવોર્ડથી પણ સન્માનિત કરવામાં આવ્યા હતા.

, અધ્યાતમવિદ્યાનો સાક્ષાત્કાર પામેલા પરમ શ્રદ્ધેય ઋષિ મકરંદ દવેના પત્ની , 'સાત પગલાં આકાશમાં' ના જનક , કંઈ કેટલાયના માં ઈશા, કુન્દનિકા કાપડિયા  'પરમ સમીપે' પહોંચવા ૨૯-૪-૨૦૨૦ની ગત રાત્રીનાં અંતિમ પ્રહરે, 'પરોઢ થતાં પહેલાં'  પ્રયાણ કર્યું. સદગતના સ્મૃતિ શેષ પૂણ્યાત્માને ભાવવંદના.



Monday, April 6, 2020

પિતાને નતકલમે શ્રદ્ધાંજલિ - પૂર્વી અરજણભાઈ લુહાર



પિતાને નતકલમે શ્રદ્ધાંજલિ
     - પૂર્વી અરજણભાઈ લુહાર
                કુંકાવાવ


મારી મીઠી સુગંધનો માળો
કોણે લપડાક મારી પિંખી નાખ્યો

મારા ખમતીધર ખોરડાનો મોભ
તેના શ્વાસનો ઠલવી લીધો ઓઘ

મૂંગી સંવેદનાઓ હવે ખુણો પાળશે
પાણીયારાની પ્યાશ કોણ બુઝાવશે

મને આંગળી પકડી વિશ્વ બતાવ્યું
એને મોતની ગરકમાં કોણે ધકેલ્યુ

મારા પુસ્તક વાંચનની પ્રેરણા
હૃદયને તારી હજુય અન્વેષણા

સર્વ મહાન આત્મા હું બડભાગી
તવ વાત્સલ્યએ ઝાઝું પલળી

 નહીં દૂર તું અહીં -અહીં ને અહીં
તવ એકેક ઉપદેશે શ્વસે હજું અહીં

પૂર્વી લુહાર કરે નતકલમે આરતી
હે. અર્જન ધન છે તારી જિવન આરસી


મહાવીર જ્યંતી


આજે જૈન ધર્મના ચોવીસમાં તીર્થંકર
ભગવાન મહાવીરની જયંતી.


ભગવાન મહાવીરના જીવના પાંચ અગત્યના પ્રસંગો ‘પાંચ કલ્યાણક’ કહેવાય.

પ્રસંગ પહેલો તો તેઓ માતાની કૂખમાં આવ્યા એ,
બીજો જન્મ પામ્યા એ,
 ત્રીજો તેમનો સંસાર છોડવાનો પ્રસંગ,
ચોથો દિવ્ય જ્ઞાન મેળવ્યાનો પ્રસંગ
પાંચમો મોક્ષ પામ્યાનો પ્રસંગ.


ભગવાન મહાવીરે બતાવેલા સુખ પ્રાપ્તિના છ માર્ગ:
 અહિંસા, દયા, સદાચાર, સંયમ, ત્યાગ, પરોપકાર.

મહાવીર અને બુદ્ધ બંને સમકાલીન. બંને ક્ષત્રિય. બંનેએ જાતિવાદ, હિંસા, આક્રોશનો તીવ્ર વિરોધ કર્યો. બંનેએ પ્રેમ, કરૂણા, સંયમ, અહિંસા, બીજાને મદદરૂપ થવાનો સંદેશ આપ્યો.

વીર બનવું સરળ છે, મહાવીર બનવું સૌથી દુષ્કર. વીરે બીજાને જીતવાનો હોય છે, એ બહું અઘરું નથી હોતું.
 મહાવીર એ જ બની શકે જે 'સ્વ' પર વિજયી થાય. 'સ્વ' પર બહુ ઓછા વિજય મેળવી શક્યા. મહાવીરનું જીવન વીરમાંથી મહાવીર બનવાનો સંદેશ આપે છે.

Monday, March 23, 2020

કોરોના બાબતે લેટેસ્ટ જાણકારી મેળવવાનો વોટ્સએપ નમ્બર

Dear All , 9013151515 हा नंबर आपल्या contact  list मध्ये mygov corona नावाने save करा .
नंतर what's app वर hi लिहून send करा ,मग आपल्याला automatically पुढील सुचना मिळत राहतात.

કોરોના બાબતે જાણકારી મેળવવા ઉપરોક્ત નમ્બરને માંય ગવર્નમેન્ટ કોરોના નામથી સેવ કરો વોટ્સએપમાં hi મૅસેજ કરવાથી આપને તમામ માહિતી મળશે try

Sunday, March 22, 2020

કેવો દેખાય છે કોરોના ચાલો જોઈએ.. ફોટોગ્રાફ

Coronavirus as seen under microscope.

માઈક્રોસ્કોપ દ્વારા કોરોના વાઇરસનો દેખાવ

વિચારોનું વૃંદાવન-કોરોના



ફોરવર્ડ મેસેજ..વિચારોનું વૃંદાવન-કોરોના

*क्या भगवान एक अफवाह (रयूमर) है ?*
    -तस्लीमा नसरीन

मक्का से वैटिकन तक, कोविड-19 ने साबित कर दिया है कि इंसान पर संकट की घड़ी में भगवान मैदान छोड़ देते हैं - तस्लीमा नसरीन

मक्का में सबकुछ ठप है.. पोप का ईश्वर से संवाद स्थगित है.. ब्राह्मण पुजारी मंदिरों में प्रतिमाओं को मास्क लगा रहे हैं.. धर्म ने कोरोनावायरस से भयभीत इंसानों को असहाय छोड़ दिया है.

ऐसा इसलिए है क्योंकि धर्म के ठेकेदारों को अच्छी तरह मालूम है कि अल्लाह हमें नोवेल कोरोनावायरस से बचाने नहीं आएंगे.. कोई बचा सकता है तो वे हैं वैज्ञानिक, जो टीके बनाने में, उपचार ढूंढने में व्यस्त हैं..

धर्म पर भरोसा करने वाले बेवकूफों को इस घटनाक्रम से सर्वाधिक विस्मित होना चाहिए, उन्हें सबसे अधिक सवाल पूछने चाहिए.. वे लोग जो कोई सवाल पूछे बिना झुंड बनाकर भेड़चाल की प्रवृति दिखाते हैं.. ना उन्हें ईश्वर के अस्तित्व का प्रमाण चाहिए, ना ही तार्किकता और मुक्त चिंतन में उनका भरोसा है.. क्या आज उन्हें ये बात नहीं कचोटती होगी कि जिन धार्मिक संस्थाओं को बीमारी के मद्देनज़र उनकी सहायता के लिए आगे आना चाहिए था, वे अपने दरवाज़े बंद कर चुके हैं?? क्या धार्मिक संस्थाओं का असली मकसद आमलोगों की मदद करना नहीं है??

बहुतों के लिए भगवान संरक्षक के समान हैं, और सलामती के लिए वे उनकी सालों भर पूजा करते हैं.. लेकिन जब मानवता संकट में होती है, तो आमतौर पर सबसे पहले मैदान छोड़ने वाले भगवान ही होते हैं..

वैटिकन से लेकर मंदिरों तक, भगवान मैदान छोड़ रहे हैं
कोरोनावायरस कैथोलिकों के पवित्रतम तीर्थ वैटिकन में भी पाया जा चुका है.. माना जाता है कि पोप भगवान से संवाद कर सकते हैं.. तो फिर वो इस समय ऐसा कर क्यों नहीं रहे?? यहां तक कि वह दैव संपर्क से किसी चमत्कारी दवा की जानकारी तक ला पाने में असमर्थ हैं.. इसके बजाय वायरस का प्रकोप फैलने के डर से वैटिकन की हालत खराब है और पोप जनता के सामने उपस्थित होने से भी बच रहे हैं..

वैटिकन में अनेक ईसाई धार्मिक त्योहार मनाए जाते हैं.. पर होली वीक, गुडफ्राइडे और ईस्टर समेत सारे भावी कार्यक्रम रद्द कर दिए गए हैं और धार्मिक सभाओं पर रोक लगा दी गई है..

हिंदू मंदिरों के ब्राह्मण पुजारी मुंह पर मास्क डाले घूम रहे हैं.. इतना ही नहीं, कुछ मंदिरों में तो देवी-देवताओं के चेहरों पर भी मास्क लगा दिए गए हैं.. हिंदू महासभा ने गोमूत्र पार्टी का आयोजन किया है क्योंकि उसे लगता है कि गोमूत्र का सेवन कोविड-19 से रक्षा कर सकता है.. कुछ लोग शरीर पर गाय का गोबर पोत रहे हैं, और उससे नहा तक रहे हैं क्योंकि वे गोबर को वायरस का प्रतिरोधक मानते हैं.. धर्म और अंधविश्वास आमतौर पर एक-दूसरे के पूरक होते हैं.. तारापीठ बंद है, वहां फूल, आशीर्वाद और चरणामृत लेने वालों की भीड़ नहीं है.. तिरुपति और शिरडी साई बाबा के मंदिर भी पाबंदियों के घेरे में हैं.. शाम की पूजा और आरती को बड़ी स्क्रीनों पर दिखाया जा रहा है..

क्या ये सब अविश्वसनीय नहीं है?? तो फिर भगवान कहां हैं?? क्या धार्मिक लोगों के मन में ये सवाल नहीं उठता??

धार्मिक स्थलों का क्या मतलब है??
सरकारों को तमाम धार्मिक संस्थाओं को दिए जाने वाले अनुदान और सब्सिडी पर रोक लगानी चाहिए.. दुनिया भर के पोप, पुजारी, मौलवी और अन्य धार्मिक नेता लोगों की गाढ़ी कमाई खाते हैं, लेकिन जरूरत के समय वे उनके किसी काम का नहीं निकलते हैं.. इसके बजाय वे लोगों को झूठ और अवैज्ञानिक तथ्यों की घुट्टी पिलाते हैं, बच्चों के साथ यौन दुर्व्यवहार करते हैं और समय-समय पर स्त्री-विरोधी फतवे जारी करते हैं.. भला ऐसे संस्थान किस काम के हैं?? इन सारे धर्मों ने नुकसान पहुंचाने के अलावा सदियों से और किया ही क्या है?? महिलाओं के निरंतर उत्पीड़न, दंगे, विभाजन, खून-खराबे और नफरत फैलाने के अलावा इनका और क्या काम रहा है??

धार्मिक स्थलों को संग्रहालयों, विज्ञान अकादमियों, प्रयोगशालाओं और कला विद्यालयों में बदल दिया जाना चाहिए ताकि उनका जनता की भलाई के काम में इस्तेमाल हो सके.. प्रकृति ने बार-बार दिखलाया है और विज्ञान ने बार-बार साबित किया है कि कोई भगवान नहीं है और धर्म एक परिकथा मात्र है.. हालांकि बहुत से लोग, विशेष रूप से दुनिया के अधिक विकसित हिस्सों में, खुद को धर्म के चंगुल से निकालने में कामयाब रहे हैं, पर जहां कहीं भी गरीबी है, सामाजिक असमानताएं हैं, स्त्री-विरोध और बर्बरता है, वहां भगवान और पूजा-पाठ पर अतिनिर्भरता देखी जा सकती है..

भगवान के लिए, विज्ञान को मानें..
अपने विकासवाद के सिद्धांत के जरिए भगवान के अस्तित्व को चार्ल्स डार्विन द्वारा नकारे जाने के लगभग 160 साल बीत चुके हैं.. मनुष्य किसी विधाता द्वारा निर्मित नहीं हैं, बल्कि उसका वानरों से विकास हुआ है.. डार्विन से बहुत पहले 16वीं शताब्दी में ही गैलीलियो और उनके पूर्ववर्ती कॉपरनिकस ने अंतरिक्ष एवं ब्रह्मांड की बाइबिल में वर्णित धारणाओं को गलत साबित कर दिया था.. इसके बावजूद, दुनिया में अधिकांश लोग परमात्मा को मानते रहे हैं.. उनके अदृश्य भगवान अदृश्य ही बने हुए हैं, उनके अस्तित्व का कोई प्रमाण आज तक नहीं मिला है, लेकिन अंधविश्वास सतत कायम रहा..

और अब जब कोरोनावायरस महामारी एक व्यक्ति से दूसरे में और एक देश से दूसरे में फैलता जा रहा है, अधिकांश धार्मिक सभाएं और समारोह स्थगित कर दिए गए हैं.. अस्वस्थता और बीमारियों से सुरक्षा पाने के लिए आमतौर पर अपने आस-पास के मंदिरों, मस्जिदों, गिरजाघरों और अन्य पूजा स्थलों की शरण में जाते रहे लोगों के लिए इस समय अस्पतालों और क्वारेंटाइन केंद्रों के अलावा और कोई ठौर नहीं बचा है..

इसलिए आज बिल्कुल स्पष्ट हो चुका तथ्य ये है: रोगों का उपचार अल्लाह, देवता या भगवान नहीं करते, बल्कि वैज्ञानिक हमें उनसे निजात दिलाते हैं.. मनुष्यों की रक्षा अलौकिक शक्तियां नहीं करतीं, बल्कि उन्हें अन्य मनुष्य ही बचाते हैं.. धार्मिक लोगों को इस समय अपने-अपने देवताओं की कृपा का नहीं, बल्कि एक टीके का इंतजार है..

धार्मिक पागलपन से छुटकारा पाने और तार्किकता को गले लगाने का भला इससे बढ़िया वक्त क्या होगा..

2026 sem. 2 time table

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